Posted in RISHTA, SHAADI, SHAYARI, ZINDAGI

-बिंदी-

तेरे माथे की वोह बिंदी हमसे कहना चाहे कुछ,
जज़्बात बयां करने से डरती है पर सुनना चाहे बोहोत कुछ,
बिंदी बैठी है जहाँ ; चूमा करते थे उन्हें हम वहां,
हठा के देखो उससे ; धुन्धले से प्यार के निशाँ नज़र आएंगे कुछ,
केहती है दे चुके सब ; देने को नहीं अब कुछ।।

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देखते है जिन्हें सपनों में हम ; मीलती है तुम्हारी सूरत उनसे कुछ,
आँखे शरमाती है और धड़कने भड़ जाती है कुछ,
देखती है वोह बिंदी मुझे एक ठक ; चल ना पाओगे मेरे साथ दुर्र तक,
समझो ना इससे नादान सा इशारा ; जानती है वोह बिंदी तुम्हारे राज़ बोहोत कुछ,
कब तक दबा के रखोगे उन् ख़यालो को ; कह दो अब सब कुछ।।

Indian-bindi

वीरानियाँ हो गई है दिल में ; लगता नहीं सिंदूर मांग में अब कुछ,
मौत की ग़ोद में बैठे थे वोह ; जाते जाते लूटा गये सब कुछ,
बिंदी निहारती है जिससे ; छोड़ गए वोह कोई समझाए इस्से,
कहने सुनने को बचा नहीं अब कुछ,
केहती है बिंदी धुन्दला गई है नज़र ; दिखाई ना देगा अब कुछ।।

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Author:

I am a simple man!!

3 thoughts on “-बिंदी-

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